धैर्यबती देवी: जहाँ धैर्य, नेटवर्क से ज़्यादा चाहिए
टेक होम राशन, Poshan Tracker और डिजिटल बोझ की ज़मीनी तस्वीर
धैर्यबती देवी 2005 से आंगनवाड़ी सेविका हैं। दो दशक के समय में उन्होंने बहुत कुछ बदलते देखा है—योजनाओं के नाम, फ़ॉर्म, रजिस्टरों की साइज,अब मोबाइल ऐप। पर जो नहीं बदला, वह है आंगनवाड़ी केंद्र की बुनियादी हालत और वह असहायता, जिसके साथ इसे रोज़ चलाना पड़ता है।
हाल के वर्षों में उनके काम में एक नया घटक जुड़ गया है—सभी माताओं का ekyc । अब टेक होम राशन (THR) जैसी बुनियादी योजनाओं के लिए भी लाभार्थियों की eKYC, Poshan Tracker ऐप पर अनिवार्य कर दी गई है।
जब मैं उनसे मिलने पहुँची, तब वह असहज थीं। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि ऐप नया था, बल्कि इसलिए भी क्योंकि मैं नई थी।
मैं बाहर से आई थी—रांची से।
और यह फर्क मायने रखता है।
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वह Poshan Tracker पर eKYC की प्रक्रिया दिखा सकती हैं, तो वह थोड़ा झिझकीं। मोबाइल हाथ में लिया, फिर नीचे रख दिया।
“अभी थोड़ा टाइम लगता है… लोड होने में,” उन्होंने कहा।
यह कोई तकनीकी टिप्पणी भर नहीं थी। इसमें अनुभव भी था और डर भी।
फील्डवर्क में ऐसे पल तुरंत पहचान में आ जाते हैं। यह वह क्षण होता है जब फ्रंटलाइन वर्कर यह तौल रहा होता है कि बाहरी व्यक्ति के सामने अपनी लाचारी दिखाना कितना सही होगा । ऐप अगर अटक गया, नेटवर्क नहीं आया, या कोई स्टेप गलत हो गया—तो यह ‘गलती’ सिस्टम की नहीं, अक्सर उसी की मानी जाती है जिसके हाथ में फोन है।
धैर्यबती देवी ने कई बार कहा कि उनका बेटा आए तो वह ऐप दिखा देंगी।
“बेटा थोड़ा बेहतर समझता है,” उन्होंने दोहराया।
थोड़ी देर बाद, जब भरोसा बना, उन्होंने खुद बताया कि Poshan Tracker में ekyc उन्हें पूरी तरह समझ नहीं आता। ज़्यादातर वह अपने बेटे से मदद लेती हैं। इस स्वीकार में शर्म कम, राहत ज़्यादा थी—जैसे कोई भारी बात कह दी हो।
इसी दौरान एक नई माँ केंद्र पर आई। चेहरा बुर्क़े से ढका हुआ, साथ में उनके शौहर । हाल ही में उनका इस आंगनवाड़ी केंद्र में पंजीकरण करवाना चाह रही थी । आज उन्हें टेक eKYC की प्रक्रिया में शामिल किया जाना था।
धैर्यबती देवी ने धीरे से कहा,
“अभी eKYC कर लेते हैं।”
प्रक्रिया शुरू हुई—आधार नंबर, नाम, मोबाइल नंबर। सब कुछ ठीक चल रहा था। फिर आया वह चरण जो डिजिटल व्यवस्था का पहला इम्तिहान होता है—OTP।
OTP नहीं आया।
जल्द ही पता चला कि आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर महिला का नहीं, बल्कि उसके भाई का था। शौहर जी बेचैन हो गया।
“ये सब बाद में कर लेते हैं,” शौहर मियां बतलाये ।
धैर्यबती देवी चुप रहीं। उन्होंने न टोका, न समझाया। eKYC अधूरी रही, तो न नाम पोषण tracker में दर्ज होंगे न THR उन्हें मिल सकेगा ।
उनके बेटे ने बात संभाली—
“अभी ही कर लेते हैं, बाद में मैं नहीं मिल पाउँगा ।”
महिला ने पति का मोबाइल लिया और बहुत धीमी आवाज़ में अपने भाई को फ़ोन किया।
स्पीकर पर भाई ने OTP सुनाया—
“बयालीस, पचासी, अठारह।”
संख्याएँ थोड़ी अस्पष्ट थीं।
“छियालिस? चौरासी?”
फिर दोहराया गया। इस बार ध्यान से। आखिरकार सही OTP डाला गया।
फिर आया अगला चरण—Face Authentication
यहाँ सिर्फ़ तकनीक नहीं थी, पूरी सामाजिक स्थिति थी। महिला का चेहरा ढका हुआ था। कहा गया कि आधार फ़ोटो जैसा चेहरा दिखाना होगा। कमरे में पुरुष मौजूद थे। महिला झिझकी, हँसी, फिर चुप हो गई।
धैर्यबती देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने इस चुप्पी को समझा। यह चुप्पी असहमति भी नहीं थी, और सहमति भी नहीं—यह उस असहजता की भाषा थी, जिसे तकनीकी प्रक्रियाएँ पहचान नहीं पातीं।
उनके बेटे ने मोबाइल महिला को थमा दिया,
“आप खुद ही सेल्फ़ी ले लीजिए।”
फोटो खिंच गई।
स्क्रीन बदली।
और फिर—
Loading… Buffering…
पाँच मिनट।
दस मिनट।
मोबाइल स्क्रीन पर घूमता हुआ गोला वहीं अटका रहा।
धैर्यबती देवी ने हल्की-सी साँस ली। धैर्यबती देवी ने हल्की-सी साँस ली। पुरानी जान-पहचान थी इस इंतज़ार से। वह जानती हैं कि पहले जहाँ किसी महिला का हस्ताक्षर बीस सेकंड में काम पूरा कर देता था, अब वही काम बीस मिनट—या उससे ज़्यादा—लेता है। और कभी-कभी, फिर भी अधूरा रह जाता है।
डिजिटलीकरण को नीति की भाषा में कुशलता कहा जाता है।
ज़मीन पर यह अक्सर अतिरिक्त श्रम, समय का नुकसान, और मानसिक बोझ बन जाता है—जिसका कोई मानदेय नहीं है।
आंगनवाड़ी सेविकाएँ न ऐप डिज़ाइन करती हैं, न सर्वर संभालती हैं, न नेटवर्क तय करती हैं। फिर भी हर तकनीकी विफलता का सामना सबसे पहले वही करती हैं। लाभार्थी का असंतोष, अधिकारी की पूछताछ और ऐप की खामियाँ—सबका बोझ उन्हीं पर उतरता है।
धैर्यबती देवी की झिझक तकनीक से नहीं है।
वह उस निगरानी और अपारदर्शी प्रक्रियाओं से हैं, जो डिजिटल सिस्टम चुपचाप अपने साथ ले आता है—जहाँ हर गलती रिकॉर्ड हो सकती है, लेकिन कोई यह नहीं देखता कि गलती किस हालात में हुई।
डिजिटल प्रक्रियाएँ अगर ज़मीन से कटकर लाई जाएँ, तो वे सुविधा नहीं, अतिरिक्त बाधा बन जाती हैं। और जब यह बोझ उन स्त्रियों पर डाला जाता है, जिनका श्रम पहले से ही अदृश्य रहा है, तो तकनीक प्रगति नहीं, दबाव बन जाती है।
धैर्यबती देवी कोई एक महिला नहीं बल्कि देश भर में हज़ारों आंगनवाड़ी सेविकाएँ हर नए सिस्टम के साथ खुद को चुपचाप ढालती हैं—चाहे नेटवर्क हो या न हो, प्रशिक्षण मिला हो या नहीं।
जहाँ नेटवर्क कमज़ोर है, वहाँ व्यवस्था धैर्य के भरोसे चलती है।
और यही धैर्य—इस देश की कई कल्याणकारी योजनाओं की असली रीढ़ है।
